Monday, August 5, 2013

वक़्त गुज़रा
और कुछ भी तो नहीं बदला
जैसे मेरा आज
मेरे कल मैं है पिघला

देख ज़रा
वहीँ खड़ा है सारा मंज़र
वहीँ खड़ी है मेरी नज़र
जहां तूने छोड़ा था
कहीं कुछ नहीं चला

सिवाय तेरे वायदों के
जो होते तो हैं पर
निभाए नहीं जाते

जो चलते तो हैं पर
कहीं पहुँच नहीं पाते

-शिव
ज़िन्दगी दब गयी बाज़ार के उधारों में
खुशियाँ बिकने लगीं जबसे इश्तिहारों में

उम्र अपनी जो औरों के नाम कर दे यहाँ
कोई मिलता है कभी सैकड़ों हज़ारों में

तुमने ठुकराया तो कोई भी चर्चा न हुआ
हम तनिक रूठे और छप गए अखबारों में

अपनी पहचान भी मैं भूल गया लगता हूँ
ज़िन्दगी ढल गयी मुख्तलिफ किरदारों में

रकीब सब हुए; सच बोलने लगा जबसे
लोग गिनते हैं मुझे पागलों, बीमारों में

-शिव
Photo: आज रात बड़ी तनहा है 
आज की रात रोई लगती है 
किसी से बिछड़ गयी शायद 
बहुत खोई खोई लगती है 

उफ़ ये गर्म हवा; ये चांदनी की तपिश 
जैसे शोलों ने इन्हें फूँका हो 
जिस्म-ओ-जाँ दोनों जले जाते हैं 
जैसे भट्टी मैं इन्हें झोंका हो 

ये समंदर के किनारे फैली बालू 
जैसे बिखरे हों ख्याल मेरे 
ये किनारे हैं के चलते जाते हैं 
जैसे ज़ेहन में सवाल मेरे 

कितना खामोश है समंदर भी 
जैसे राह तकता हो तूफानों की 
मेरा दिल है के भरा आता है 
आंधियां जैसे हों अरमानों की 

आज की रात और मेरा दिल 
फर्क कोई नहीं है दोनों में 
ये भी रोई है; मैं भी रोया हूँ 
ये भी खोई है; मैं भी खोया हूँ 
आज की रात बड़ी तनहा है 

-शिव
आज रात बड़ी तनहा है 
आज की रात रोई लगती है 
किसी से बिछड़ गयी शायद 
बहुत खोई खोई लगती है 

उफ़ ये गर्म हवा; ये चांदनी की तपिश 
जैसे शोलों ने इन्हें फूँका हो 
जिस्म-ओ-जाँ दोनों जले जाते हैं 
जैसे भट्टी मैं इन्हें झोंका हो 

ये समंदर के किनारे फैली बालू 
जैसे बिखरे हों ख्याल मेरे 
ये किनारे हैं के चलते जाते हैं 
जैसे ज़ेहन में सवाल मेरे 

कितना खामोश है समंदर भी 
जैसे राह तकता हो तूफानों की 
मेरा दिल है के भरा आता है 
आंधियां जैसे हों अरमानों की 

आज की रात और मेरा दिल 
फर्क कोई नहीं है दोनों में 
ये भी रोई है; मैं भी रोया हूँ 
ये भी खोई है; मैं भी खोया हूँ 
आज की रात बड़ी तनहा है 

-शिव

मैं जानता हूँ
तू मुझसे खफ़ा खफ़ा सा रहता है
नज़र नज़र मिली जहाँ
छुपा छुपा सा रहता है

और मैं भी देख तो
खुश कहाँ ग़मगीन हूँ
जाने क्यूं मेरा भी दिल
भरा भरा सा रहता है

तेरे मेरे दरमियाँ
बस आबरू का ये पर्दा
मुस्कुराता रहता है

तू खफ़ा है मैं दुखी
बस भरम है हर ख़ुशी
फिर भी देख तो ज़रा
ये सब छुपाता रहता है

आबरू का ये पर्दा
अपना अब सहारा है
ये ही तल्ख़ रिश्तों का
सूखा हुआ धारा है

तेरी मेरे जीवन का
ये ही बस किनारा है

-शिव
ये वक़्त ये नसीब
जैसे क़र्ज़ माँगा हो
और इस क़र्ज़ को
चुकाऊँ तो चुकाऊँ कैसे

जीता तो हूँ पर
ज़िन्दगी मेरी नहीं
कमी सब कुछ और लगता है
कोई कमी भी नहीं

ये अन्धेरा और
रौशनी का कोई सुराग़ नहीं
मेरे सवालों का
कोई भी जवाब नहीं

ऐ! ख़ुदा कोई राह दिखा
अब तो लगता है

इस रात की
कोई सुबह ही नहीं
और इस आज का
कोई कल ही नहीं

-शिव

तू जो मुझको बताता है सच ऐसा नहीं होता
तू जैसा नज़र आता है सच ऐसा नहीं होता

जुबां अटकी निगाहें चोर और अंदाज़ बहका सा
ये क्या मुझको सुनाता है सच ऐसा नहीं होता

सच की हर आवाज़ में आवाज़ है उस की
तू बस फितने उठाता है सच ऐसा नहीं होता

यकीं कर लूं तेरी बातों का मैं ये सोचता हूँ पर
तू कुछ का कुछ दिखाता है सच ऐसा नहीं होता

छुपा है दिल में जो तेरे; तेरे चेहरे से पढता हूँ
मुझी से क्यूँ छुपाता है सच ऐसा नहीं होता

फितने - शरारतें
उस - खुदा , भगवान्

-शिव 
तू फरेबों की आब-व्-ताब रहा
सच मगर मेरा पुरशबाब रहा

ख्वाब तुझको रहा तेरा ही सफ़र
मेरी मुट्ठी में मेरा ख्वाब रहा

जुबां खामोश और मन में लगन
मुसलसल तुझको ये जवाब रहा

गुनाह लाख दबाये तूने सीने में
में मगर इक खुली किताब रहा

सह गया जुल्मोसितम सब तेरे
अब क्या बाक़ी तेरा हिसाब रहा

* आब-व्-ताब - चमक दमक

-शिव